सोमवार, 25 जुलाई 2011

आइये आज कुछ ''काव्य कल्पना'' हो जाये

   असलम कौल ''असली'' ने कहा है-
 '' कभी इश्क करो और फिर देखो ,
  इस आग में जलते रहने से,
   कभी दिल पर आंच नहीं आती,
   कभी रंग ख़राब नहीं होता .'' 
          प्रेम न सिर्फ कलाकारों को ,लेखकों को और दार्शनिकों को प्रेरित करता है बल्कि आज के ब्लॉग जगत के मशहूर इंजीनियर  साहब सत्यम शिवम् जी को भी इसी भाव ने इतना प्रेरित किया है की उनके ब्लॉग पर इस भाव से भरी बहुत सुन्दर प्रस्तुति हमें आये दिन अवलोकन हेतु मिलती ही रहती है .सत्यम जी का ब्लॉग काव्य कल्पना न केवल प्रेम भाव से पूरित कवितायेँ प्रस्तुत करता   है बल्कि सत्यम जी ने इस ब्लॉग में अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए इतने सुन्दर और भावपूरित चित्रों को जगह दी है कि हर पोस्ट संग्रहणीय हो गयी है .चलिए आप को अब इनके ब्लॉग का url  भी दे ही देते हैं -
 सत्यम  जी के ब्लॉग तो यूँ और भी हैं और आज वे किसी परिचय के मोहताज भी नहीं हैं ब्लॉग जगत में .उनके ब्लॉग पर फ़िलहाल जो प्रस्तुति है वह 4-५ दिन पहले की है आप अभी उसी का अवलोकन कीजिये और बताइए कि क्या हम  सही नहीं कह रहे हैं-

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।
तुम्हारे पास होकर भी, 
मै तुमको छू न पाया था।

मेरा दिल चाहता था खुद में यूँ भर लूँ मै तुमको आज,
मगर अफसोस मैने हर पल तुमको गवाँया था।

नशा वह रात में था,
या तुम्हारी बात में था,
जो मुझको खींच कर बेसुध बना,
तेरे पास लाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

बहुत अरमान थे जिनको था पाला,
लम्बे अरसे से,
वही कुछ बोल मेरी आँखों से,
उस रात बरसे थे।

कभी सोचूँ जो तुमको पाने का,
यह ख्वाब है या सच।

नहीं थी तुम कही भी,
बस अंधेरे में मेरा ही साया था।
कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

अभी तो रात की सारी कहानी,
पूरी बाकी है।

फलक पर चाँद भी शायद,
अभी अभी ही आया है।

मोहब्बत की कहानी चाँद की थोड़ी पुरानी है,
यही सोचकर मैने नया किस्सा बनाया है।

अधूरा है तेरे बिन,
मेरा होना या ना होना।

तुम्हारे ना होने के एहसास ने,
फिर क्यों मुझको रुलाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।

कहूँगा तो हँस दोगी,
कहोगी झूठे हो।

मगर हर रात यूँ ही जाग कर,
मै भोर करता था।
तुम्हारी यादों से लड़ कर जो,
मेरी हालत होती थी,
तन जिंदा होता था,
बेचारा मन बस मरता था।

सुनोगी तुम नहीं जिस गीत को,
मै जानता था पर।

वही इक गीत मैने हर रात,
क्यों तुमको सुनाया था।

कसक है आज भी दिल में दबी,
उस रात की कोई।

तुम्हारे पास होकर भी मै तुमको छू न पाया था।
तो अब आप सभी देखिये सत्यम जी का ब्लॉग और प्रेम के उनके भावों में ही खो जाइये


शालिनी कौशिक

10 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

अल्लाह का शुक्र है कि हमें ऐसा कोई अफ़सोस नहीं है । सत्यम जी का ब्लॉग और आपकी प्रस्तुति अच्छी है ।

शुक्रिया !

सहज समाधि आश्रम ने कहा…

सत्यम शिवम सुन्दरम
very very nice शालिनी जी

S.N SHUKLA ने कहा…

सुन्दर ब्लॉग भी और उसका परिचय करान का तरीका भी , आभार

विभूति" ने कहा…

बहुत ही सुंदर अभिवयक्ति... उस रात की..!!

Shikha Kaushik ने कहा…

सत्यम जी तो ब्लॉग जगत की अब जानी मानी हस्ती हैं .उनके ब्लॉग का यहाँ परिचय देकर आपने हम सभी को फिर से एक अच्छे ब्लॉग को देखने का सुअवसर प्रदान किया है .

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत बहुत धन्यवाद।

रेखा ने कहा…

सत्यमजी से परिचित तो हूँ लेकिन उनकी रचना पढ़ने का मौका नहीं मिला .......बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति इतनी अच्छी रचना पढने का मौका देने के लिए धन्यवाद

प्रेम सरोवर ने कहा…

मौतबर शख्स हमें मिलता नहीं,
ये यकीं हर किसी पर होता नहीं.
ये तन्हाई की ही सलाहियत है,
जो सीरत को संजीदगी सिखाती है.


बहुत ही अच्छा लगा। मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बेहतरीन लिंक्‍स की बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद!

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

9 दिन तक ब्लोगिंग से दूर रहा इस लिए आपके ब्लॉग पर नहीं आया उसके लिए क्षमा चाहता हूँ ...आपका सवाई सिंह