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रविवार, 31 जुलाई 2011

जरा बचके ये ''एम्.सिंह की दुनाली''

इस बार तो आप सभी को बुलेट प्रूफ पहन कर हमारे इस ब्लॉग की प्रस्तुति को देखना होगा कारण वही गोलियां चलने का लगातार खतरा बना  है   और चलिए हम तो बच जायेंगे क्योंकि हम तो उनके पीछे खड़े होकर  आपको ये सब बता रहे हैं किन्तु सामने खड़े होने के कारण आपको ज्यादा ख़तरा है चलिए वैसे लगता है कि इस वक़्त उनकी दुनाली में गोलियां नहीं हैं वे तो कल ही खाली होगई थी इसलिए तो रुके हुए थे हम कि पहले वे गोलियां ख़त्म हो जाएँ तभी हम  उनके बारे में कुछ कहें .अब ये देखिये उनकी दुनाली के सामने हमारे साथ हमारे शिष्य साधू संत स्वभाव के ''राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी'' भी साथ में थे किन्तु एम्.सिंह जी को दुनाली में गोली भरते देख ऐसे साफ हो गए कि पिछले दो हफ्ते   से उनका कोई अता पता ही नहीं  अगर आपमें से किसी को वो कहीं मिलें तो कृपया उन्हें यहाँ पहुंचा दें नहीं तो इतने दिन बाद तो पुलिस भी गुमशुदा में रिपोर्ट दर्ज करने में काफी दिक्कत दिखाएगी .
     चलिए अब उनकी चिंता को छोड़कर एम् सिंह जी के ब्लॉग दुनाली पर बेखटके चलते हैं .ब्लॉग url  है-

आज आप उनकी दुनाली कि एक गोली ही देखिये काफी जबरदस्त असर करने वाली है.
इस बार हदों की भी हदें लांघी हैं न्‍यूज़ 24 ने. पता नहीं चैनल कौन चला रहा है और उसका मकसद क्‍या है, पर एक बात तय है कि जो भी इसके मालिक या एडिटर होंगे, उन्‍हें न्‍यूज़ की कोई समझ नहीं होगी.
शनिवार शाम सात बजे के बुलिटेन में धोनी का छुपा हथियार का हैडिंग चल रहा था. समझा शायद कुछ खास दिखा रहे होंगे. काफी देर बकवास करने के बाद युवराज सिंह को छींकते हुआ दिखाया गया.
स्‍क्रीन पर लिखा था- छुपा हथियार बनाएगा धोनी को ट्रेंटब्रिज का सिंघम.
वाइस ओवर था-
युवराज जैसे-जैसे छींके, विकेट गिरते रहे.
अंग्रेजों के विकेट गिराने का कारनामा तेज गेंदबाजों की तिकड़ी ने नहीं किया, यह कारनामा किया युवराज की छींकों ने.
जब भी युवराज छींकते, विकेट गिरता...
तीनों गेंदबाज कुछ नहीं कर पाए, युवराज ने विकेट गिराए.
जी हां, यही था धोनी का छुपा हथियार.
और भी न जाने क्‍या-क्‍या कहा.
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हम तो यही चाहेंगे कि युवराज छींकते रहें और इं‍ग्‍लैंड के विकेट गिरते रहें.

आखिर क्‍या साबित करना चाहते हैं ऐसे न्‍यूज़ चैनल्‍सइनका क्‍या स्‍तर है?
और  अब  जानिए  इनके  बारे  में-


मेरे बारे में


पढ़ाई में जीरो तो नहीं पर जीरो से ज्यादा भी न था. मैथ्स और साइंस तो कभी पल्ले नहीं पड़े. इतिहास में कभी अच्छे नंबर नहीं आए. भूगोल भी समझ के परे था. अंग्रेजी में पास होने लायक नंबर मिल जाते थे, हिन्दी भी ठीक-ठाक थी. गणित के सवालों पर ही मेरा दिमाग सवाल उठाता था. आखिर ये वर्गमूल और स्केयर आदि आम जिंदगी में कहां काम आएंगे? माता-पिता, पड़ोसी या दुकानदार कभी मैथ्स के सूत्रों का इस्तेमाल नहीं करते तो मैं क्यों सीखूं?
क्रिकेट और शतरंज में दिमाग खूब चलता था. कॉलेज में पहुंचा तो अर्थशास्त्र, राजनीतिक विज्ञान और कम्यूटर में रुचि हुई. कम्यूटर अच्छे से समझ में आता था. बीए के बाद मास कम्यूनिकेशन्स की पढ़ाई की. संचार की ताकत और तरीकों को जाना. इस दौरान जिंदगी के कुछ बहुत खूबसूरत तो कुछ बेहद निराश करने वाले लम्हों को जीया. काफी कुछ सिखाया यूनिवर्सिटी के दो सालों ने. पर उससे कहीं ज्यादा सीखना अभी बाकी है.
पढ़ाई खत्म की तो प्रिंट मीडिया में नौकरी शुरू की. पंजाब केसरी, दैनिक भास्कर और फिर हिन्दुस्तान में काम किया. पत्रकारिता के साथ-साथ राजनीति से भी वास्ता पड़ा. साढ़े 4 साल प्रिंट मीडिया में रहा. अब खुदा को कुछ और ही मंजूर था. हालात ऐसे बने कि हिन्दुस्तान में मेरे ढ़ाई साल के करिअर का अंत हुआ. जीवन में एक बड़ा परिवर्तन आया. एक गांठ बांधी कि जीवन में कभी भी किसी भी हालात में नशा नहीं करना है. नशा तो पहले भी नहीं करता था, लेकिन कभी-कभार महफिल में बैठ जाता था.
शायद भगवान कुछ और समय नौकरी करवाना चाहता था, इसलिए वेब मीडिया में चांस मिल गया. आजकल दिल्ली की भीड़ बढ़ा रहा हूं और मोबाइल वैस व वेब मीडिया में काम कर रहा हूं. अब आगे क्या होगा? राम जाने.
और हां, भला ब्लॉगिंग का जिक्र कैसे भूल सकता हूं. लिखने का चस्का काफी पहले से था. खुद को अकेले पाना और फिर अकेलेपन को दूर करने के लिए लिखना. कुछ कहना चाहें और कह ना पाएं तो उसे लिख देना. किसी को गाली न दे सकना और लिख देना. किसी गलती पर प्रायश्चित करने के लिए कागज पर लिख देना. बस. हमारे आस-पास बहुत-सी चीजें हमें कहने या लिखने को मजबूर करती हैं. कुछ लोग कहना पसंद करते हैं तो कुछ लोग लिखना. और कुछ लोग दोनों ही पसंद करते हैं. मैं लिखने में ज्यादा विश्वास करता हूं. इसलिए ब्लॉग पर हूं.

-मलखान  सिंह
अब देखिये और जानिए इनके बारे में और इनके ब्लॉग दुनाली के बारे में.हम भी बेकार ही डर रहे थे अच्छा हुआ जो ' 'मेरे  बारे में ''पढ़ लिया आप भी अब डरना छोडिये और दुनाली पर बेखटके जाइये.और जरा सहायता कीजिये राजीव जी को ढूँढने में भी वे तो अभी तक दुनाली से डर कहीं छिपे बैठे हैं.
                                         
  शालिनी कौशिक


6 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

शालिनी जी बहुत रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है आपने ''दुनाली 'ब्लॉग का परिचय .आभार

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

शालिनी जी बहुत रोचकता के साथ प्रस्तुत किया है आपने ''दुनाली 'ब्लॉग का परिचय .

आभार

Nice post.

Nice comment.

S P Singh ने कहा…

very very informative post.

Neelkamal Vaishnaw ने कहा…

शालिनी जी बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

मै भी इस ब्लाग (ये ब्लाग अच्छा लगा) की सदस्यता लेना चाहता हूँ मेरा मेल पता नीचे है कृपया लिंक प्रदान करने का कष्ट करे

www.neelkamalkosir@gmail.com

आपका अपना ब्लागर मित्र
नीलकमल वैष्णव "अनिश"
www.neelkamalkosir.blogspot.com

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

आदरणीया शालिनी जी,
आपने 'दुनाली' ब्लॉग का परिचय....शुक्रिया.

RAJEEV KULSHRESTHA ने कहा…

रोचक सुन्दर प्रस्तुति
बङा बिजी हूँ अभी तो - क्या करूँ