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शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

कुछ मुद्दे....जो हमारे लिए वांछित होने चाहिए....!!


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
कुछ मुद्दे....जो हमारे लिए वांछित होने चाहिए....!!

मिस्टर राहूल,तुम्हारे कहने अनुसार अगर लोकपाल भी भ्रष्ट होगा तो तुम प्लीज़ चिंता मत करो,उसे जनता बदल देगी,ठीक उसी तरह जिस तरह आने वाले चुनावों में वह तुम समस्त लोगों को बदल देने वाली है....!!
ओ संसद के तमाम सांसदों,तुम सब जिस तरह जन-लोकपाल के प्रश्न पर जिस तरह का दोहरा आचरण कर रहे हो,उसका प्रत्युत्तर जनता तुम्हें जल्द ही देने वाली है,तुम जैसे तमाम सांसदों का अबकी बार संसद से सफाया होकर ही रहेगा,तुम्हारा धनबल,बाहुबल या कोई भी छल-कपट तुम्हें नहीं बचा पायेगा...!!
एक अपील हम जनता से....आने वाले चुनावों में वह साफ़-स्वच्छ छवि वाले वाले उम्मीदवार को हो अपना मत दे,ऐसे किसी को उम्मीदवार को वह धन आदि की कमी के चलते हारने ना दे,उसे भरोसा दे,और इतना ही नहीं उसके जीतते ही उसके घर जाकर उसे बधाई देने के पश्चात उस पर जनता के लिए कार्य करने का नैतिक दबाव बनाए...!! 
अब जनता आने वाले दिनों में अपने-अपने क्षेत्र के सांसदों से उसके किये-धरे का चिठ्ठा मांगे,और जिसने जो कुछ भी अवैध अर्जित किया हो,उसकी बाबत सवाल पूछे,उसका समुचित उत्तर ना मिल पाने पर उस सांसद का क्या करना है उसके बारे में मिल बैठ कर सोचे...!! 
यह भी बड़ी अजीब बात है की आप चोरी करो,डाका डालो,लड़कियों के साथ बिस्तर गर्म करो,देश की सुरक्षा तक के साथ खिलवाड़ करो,देश का धन बाहर ले जाओ...अपना ही घर बस भरते जाओ,भरते जाओ,भरते जाओ और हम कुछ कहें या पूछे तो कहो यह अशोभनीय है,यह भाषा अनुचित है,असंसद्नीय है ,तो अब तुम्ही बताओ हमें ,क्या उचित है,क्या अनुचित !!
दोस्तों, भारतमाता किसी अन्ना के बहाने से आप-हम-सबे दिलों पर यह दस्तक दे रही है,के हम भी अब सुधर जाएँ,बदल जाए और एक हद तक सच्च्चरित्र हो जाएँ(क्यूंकि हम भी तो पूरा नहीं बदल सकते...!!??)सिर्फ दूसरों को गरियाने से कुछ नहीं बदलेगा,हरेक चीज़ के इकाई हम खुद हैं,हमें खुद को जिम्मेदार-सभ्य और निष्कलंक नागरिक बनना होगा...!!
अगर सच में ही हम खुद को भारतीय कहतें हैं,तो भारतीयता के निम्नतम कसौटी के ऊपर खुद को कसना होगा,एक नागरिक के रूप में हमारे भी क्या कर्तव्य हैं,उन्हें पूरा करना ही होगा,वरना एक जन-लोकपाल तो क्या एक लाख लोकपाल या जन-लोकपाल भी रत्ती-भर मात्र भी कुछ नहीं उखाड़ पायेंगे,आन्दोलन का रोमाच एक बात है...और खुद को बदलना बिलकुल दूसरी बात..!!
हमारे ह्रदय में हमारी आत्मा में क्या पक रहा है,इसी पर देश का भविष्य सुनिश्चित है,हम खुद को कुछ बनाना चाहते हैं,या देश को सचमुच कहीं ले जाना चाहते हैं,यह बिलकुल स्पष्ट तय नहीं है तो इस आन्दोलन-वान्दोलनों का कोई अर्थ नहीं है ,सिर्फ हमारी खुद के गुणवत्ता ही देश को वाजिब उंचाई प्रदान कर सकती है..!! 
अब सिर्फ यही आत्म-मंथन करना है,के हम क्या थे,क्या हैं,और क्या होंगे अब....!!सिर्फ एक नेक विचार देश को नयी उंचाईयां प्रदान कर सकता है,क्या कुछेक विचारों पर सोचने को,उन्हें अपने दिल में जगह देने को,उन पर चलने को हम तैयार हैं....??
अन्ना एक निमित्त बन चुके...अब आगे का काम तो हम अरबों लोगों का ही है,सत्ता के लोगों का अहंकार संभवतः अन्ना को "भूतकाल"में परिणत कर दे, क्योंकि डोलते हुए भयभीत सांसदों से अब शायद कोई उम्मीद ही नहीं के सकती,तो अगर अना ना रहें तो हमें क्या करना है....!!????
प्रश्न तो ढेर-ढेर सारे हैं....आर उत्तर खुद हमारे ही भीतर....उत्तर ढूँढ लें,समस्याएं स्वतः ही हल हो जायेंगी,यह समय आन्दोलन से अधिक अपने भीतर झाँकने का है,खुद को सही दिशा प्रदान करने का है....!!
हर तरफ-हर जगह यह लिखा हुआ पाया जा रहा है,मैं अन्ना हूँ,मैं अन्ना हूँ,मैं अन्ना हूँ....ज़रा सोचिये...एक अन्ना ने एक आंधी पैदा कर दी है...हम सब यदि अन्ना हो गए,तो फिर देश को उंचाईयों पर पहुँचते देर ही कहाँ लगेगी...!!

2 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

nice post .

शालिनी कौशिक ने कहा…

shayad jyada hi unche pahunch jayenge.sabhi anna nahi hote rajeev ji .nice post