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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

बाप बङा ना भैया सबसे बङा रुपैया - मनीषा

कसम से मनीषा जी का परिचय पढकर मुझे बहुत बोरियत आयी । बिकाज वे कहती हैं - माँ के शिक्षक होने से बचपन से ही पढने लिखने की आदत हो गयी ।.. लो कर लो बात । भैया मेरी माँ भी शिक्षिका थी । उनकी सगी भाभी तो यूनिवर्सिटी की डीन हैं । घर में बहन बहनोई etc सभी शिक्षक ही भरे हैं । मगर मजाल " राजीव बाबा " ने काले अक्षर और भेंस में कभी कोई फ़र्क समझा हो ।
बिकाज माय शिखा मैम सेस - अम्मा जी का घी किताबें चाटने में वेस्ट करोगे । जाओ स्ट्रीट लाइटें फ़ोङो । लोगों की खिङकियों के शीशे तोङो etc अरे क्रांतिकारी क्या ऐसे ही बनोगे ?
खैर..आगे मनीषा जी बोलिंग - पति ने उत्साह जगा दिया ।..अब भैया आपके पति हैं । तो उन्होंने उत्साह जगा दिया । यहाँ तो कोई पति ( की विलोमिनी ) है ही नहीं । फ़िर जोश कैसे आये ?
आगे तो सब ठीक है । बस इनकी एक बात और खटकी - अध्यापन में मन लगाया । पर मज़ा नहीं आया । लो फ़िर कर लो बात । अरे मनीषा जी आप हमारे M.S.M.P.S ( made super made public school ) में पढाकर देखतीं । आपको पढाने में क्या पढने में भी मजा आता ।
हमारे स्कूल की शुभ प्रार्थना ( रोज नयी और ऐसी ही ) ही - ये ईलू ईलू क्या है ? गाकर शुरू होती है । फ़िर पहला पीरियड - ओ मुन्नी रे । तेरा गली गली में जलवा रे । इस तरह का होता है ।
हमारी नैतिक शिक्षा की मैम विद डांस इस तरह टीच करतीं हैं - पढना लिखना छोङो । नैनों से नैना जोङो ।
अब मनीषा जी आप खुद समझदार हो । फ़ुल्ली छुट्टी का घण्टा पियोन छह छह बार बजाता है । पर हमारे एडूकेशन लवर सटूडेंट सकूल से जाने का नाम ही नहीं लेते । डण्डा से भगाओ । फ़िर भी नहीं भागते । और आप कहती हो - अध्यापन में मजा 


नहीं आया । कोई होपलेस टायप सकूल रहा होगा । इसलिये ।
हाँ वाकिंग वाकिंग आपकी एक बात और - रूपए पैसे से रत्ती भर भी मोह नहीं । अरे भैया ! मोह नाहीं । तो काहे ऐसा फ़ालतू चीज अपने पास रखती हो । हमको दे दो । हम फ़ालतू चीज का बहुत शौकीन हूँ ना ।
खैर..ऐसी यूनिवर्सल वैल्यूबल रिपोर्टिंग तो मैं आपको देता ही रहता हूँ । इसलिये फ़िलहाल आप मनीषा जी से मुलाकात करिये ।
मनीषा जी का परिचय उनके ही शब्दों में - माँ के शिक्षक होने के कारण बचपन से ही घर में पढ़ने लिखने के माहौल ने पढ़ने की आदत डाल दी और मीडिया से जुड़े पति के साथ ने लिखने का उत्साह जगा दिया । शायद यही कारण है कि न्यूज़ में दिलचस्पी बढ़ती गयी । और पढ़ने लिखने का यह नशा ब्लागरों की दुनिया तक खींच लाया । शुरुआत में इकलौती बेटी के लालन पालन से जुडी व्यस्ताओं और घर के काम काज ने उतना समय नहीं दिया । 


पर अब तो दस साल की बिटिया भी ब्लागर बनने की ज़िद करने लगी है । इसलिए मेरा कंप्यूटर पर हाथ चलाना अपरिहार्य हो जाता है । वैसे मैं मध्यप्रदेश में संस्कारधानी के नाम से विख्यात जबलपुर में पली बढ़ी हूँ । और फिलहाल देश की राजधानी दिल्ली की जीवन शैली से कदम मिलाने का प्रयास कर रही हूँ । अर्थशास्त्र की छात्रा होने के बाद भी रूपए पैसे से रत्ती भर भी मोह नहीं । पर संगीत के हिसाब किताब में सिद्धहस्त हूँ । कुछ समय तक अध्यापन में भी मन लगाया । पर मज़ा नहीं आया । अब नए और रोचक विषयों को जानने और सभी को उनसे रूबरू कराने में जुटी हूँ । इनका ब्लाग - सुरंजनी

3 टिप्‍पणियां:

शालिनी कौशिक ने कहा…

kya bat hai rajeev ji aaj kafi vyathit dikhai de rahe hain aap. kabhi pati ki vilomni kee duhai to kabhi paise kee dimand aap jaise sadhu sant vyakti aisee post prastut karenge to ham sansarik logon ka kya hoga.
bahut sundar prastut kiya hai maneesha ji ka parichay.vaise aapki katori devi blog ke bahar danda liye khadi hain aur jhola bhi.ha ha ha ab aayega maza.

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत ही सुन्दर लिंक्स है.

शिखा कौशिक ने कहा…

very nice post