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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बरगद और मैं


http://atulshrivastavaa.blogspot.com

सेकंड,
मिनट,
घंटा,
दिन,
महीना,
और साल.....।
न जाने
कितने कैलेंडर
बदल गए
पर मेरे आंगन का
बरगद का पेड
वैसा ही खडा है
अपनी शाखाओं
और टहनियों के साथ
इस बीच
वक्‍त बदला
इंसान बदले
इंसानों की फितरत बदली
लेकिन
नहीं बदला  तो
वह बरगद का पेड....।
आज भी
लोगों को 
दे रहा है
ठंडी छांव
सुकून भरी हवाएं.....
कभी कभी
मैं सोचता हूं
काश इंसान भी न बदलते
लेकिन
फिर अचानक
हवा का एक  झोंका आता है
कल्‍पना से परे
हकीकत से सामना होता है
और आईने में
खुद के अक्‍श को देखकर
मैं शर्मिंदा हो जाता हूं

4 टिप्‍पणियां:

शिखा कौशिक ने कहा…

.कभी कभी मैं सोचता हूं काश इंसान भी न बदलते- bahut sundar bhavo ko abhivayakt karti aapki prastuti srahniy hai .badhai.

शालिनी कौशिक ने कहा…

कल्‍पना से परे
हकीकत से सामना होता है
और आईने में
खुद के अक्‍श को देखकर
मैं शर्मिंदा हो जाता
atul ji bahut din bad aapki koi prastuti dekhne ko mili bahut achchhi lagi aabhar.

दर्शन कौर धनोए ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !

Atul Shrivastava ने कहा…

शुक्रिया आप सबका।
http://atulshrivastavaa.blogspot.com/