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रविवार, 7 अगस्त 2011

कैसे यकीं आये वो मुझसे प्‍यार करता है - निर्मला कपिला

निर्मला जी का हमारे बीच होना मुझे हमेशा ही एक सुखद अनुभूति सी देता है । मेरे परिचित ब्लागर्स बन्धु और नेट यूजर्स भली भाँति जानते हैं । बुजुर्गों के अधिकार और समाज परिवार में उनका सम्मानीय स्थान.. इस बात का मैं प्रबल पक्षधर रहा हूँ । और ये महज कोरी सहानुभूति नहीं है । या हमारी भारतीय संस्कृति परम्परा आदि की लीक पीटने भर के लिये बात नहीं है । बल्कि ये मेरे अपने जीवन अनुभव में बुजुर्गों की संगति से स्वतः उपजा ह्रदयी उदगार है । स्वतः खिला भावना पुष्प है ।
इसकी वजह भी बङी महत्वपूर्ण थी । पढाकू प्रवृति होने के कारण इतिहास की किताबें । शोध पुस्तकें आदि में सिर खपाने के दौरान इत्तफ़ाकन जब बुजुर्गों से किसी विषय पर बात की । तो उनके पास सरल और सहज  सुलभ रूप में जानकारियों का खजाना ही मौजूद था । जो बात हम एक मोटी किताब से घण्टों अध्ययन के बाद जानते । उससे बहुत ज्यादा मुझे उनसे आसानी से प्राप्त हुआ । संक्षिप्त में कहूँ । तो सिर्फ़ हमारी प्रेम भावना के भूखे बुजुर्ग चलता फ़िरता समय का इतिहास हैं । बस हम आधुनिकता में उनकी उपेक्षा करते हुये उनकी सही कीमत नहीं जानते । सच मानिये । मेरा यही दृष्टिकोण है ।
ब्लाग जगत की सशक्त हस्ताक्षर निर्मला जी का ब्लाग मैंने आज अचानक ही नहीं खोजा । बल्कि मैं शुरूआत से ही उन्हें जानता हूँ । बेबाक..खुली..स्पष्ट बात कहने और पारदर्शी टिप्पणी करने वालीं निर्मला कपिला जी लिखतीं भी उसी बेबाकी से हैं ।
निर्मला जी अपने बारे में कहती हैं -


अपने लिये कहने को कुछ नहीं मेरे पास । पंजाब मे एक छोटे से खूबसूरत शहर नंगल मे होश सम्भाला । तब से यहीं हूँ । B.B.M.B अस्पताल से चीफ फार्मासिस्ट रिटायर हूँ । अब लेखन को समर्पित हूँ । मेरी 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । 1 - सुबह से पहले ( कविता संग्रह ) 2 - वीरबहुटी ( कहानी संग्रह ) 3 - प्रेमसेतु ( कहानी संग्रह ) आजकल अपनी रूह के शहर इस ब्लाग  पर अधिक रहती हूँ । आई थी । एक छोटी सी मुस्कान की तलाश में । मगर मिल गया । खुशियों का समंदर । कविता । कहानी । गज़ल । मेरी मनपसंद विधायें हैं । पुस्तकें पढना और ब्लाग पर लिखना मेरा शौक है । इनका ब्लाग - वीर बहूटी वीरांचल गाथा ।


*** इस ब्लाग पर निर्मला जी को लाना ( उनका परिचय कराने की बात कहने का तो कोई आधार ही नहीं बनता । उनसे सभी पूर्व परिचित ही हैं ) मेरी दिली इच्छा थी । इस हेतु मैं उनके ब्लाग से एक गजल भी साथ में चाहता था । पर ब्लाग लाक्ड था । अतः मैंने उन्हें कमेंट में इस बात का आग्रह किया । तब निर्मला जी ने मुझे मेल द्वारा गजल भेज दी ।
- राजीव जी नमस्कार । बहुत दिन से नेट से दूर थी । आपके कमेंट के लिये धन्यवाद । और मेरी गज़ल की समीक्षा के लिये गज़ल मंगवाने के लिये भी धन्यवाद । गज़ल भेज तो रही हूँ । लेकिन अभी गज़ल में महारत हासिल नहीं है । बस सीख रही हूँ । जितने शेर गर्मियों की दुपहरी पर लिखे । सभी भेज रही हूँ । जबकि 7 य्क़्क़ 9 शेर स्4ए अधिक नहीं होने चाहिये । बाकी आप देख लें । धन्यवाद ।
*** मैं भला उनकी गजल की समीक्षा क्या करूँगा । आप लोग खुद ही देख लो । मेरी बात सच है । या नहीं ।
न वो इकरार करता है न तो इन्कार करता है । मुझे कैसे यकीं आये, वो मुझसे प्‍यार करता है ।
फ़लक पे झूम जाती हैं घटाएं भी मुहब्‍बत से । मुहब्‍बत का वो मुझसे जब कभी इज़हार करता है ।
मिठास उसकी ज़ुबां में अब तलक देखी नहीं मैंने । वो जब मिलता है तो शब्‍दों की बस बौछार करता है ।


खलायें रोज देती हैं सदा बीते हुये कल को । यही माज़ी तो बस दिल पर हमेशा वार करता है ।
उड़ाये ख्‍़वाब सारे बाप के बेटे ने एबों में ।  नहीं जो बाप कर पाया वो बरखुरदार करता है ।
नहीं क्‍यों सीखता कुछ तजरुबों से अपने ये इन्‍सां । जो पहले कर चुका वो गल्तियां हर बार करता है ।
उसी परमात्‍मा ने तो रचा ये खेल सारा है । वही धरती की हर इक शै: का खुद सिंगार करता है ।
अभी तक जान पाया कौन है उसकी रज़ा का सच । नहीं इन्‍सान करता कुछ भी, सब करतार करता है ।
कहां है खो गई संवेदना, क्‍यों बढ़ गया लालच । मिलावट के बिना कोई नही व्यापार करता है ।
बडे बूढ़े अकेले हो गये हैं किस क़दर निर्मल । नहीं परवाह कुछ भी उनका ही परिवार करता है ।


इनका ब्लाग - वीर बहूटी । वीरांचल गाथा