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रविवार, 27 मार्च 2011

ये जोत ( ज्योति ) से जोत जलाते चलो । वाली देवी जी कौन हैं ?

एक बार मैं शिखा जी के घर गया । 
तो उन्होंने कहा - आईये..खङे रहिये । 
मैंने कहा - कमाल है मैडम ! सब कहते हैं । बैठिये प्लीज ! और आप कह रहीं हैं..कमाल है । 
तब शिखा जी ने खङे खङे ही खङी बोली में खङी खङी ( आई मीन.. मतबल खरी खरी ) सुनाते हुये कहा -  मिस्टर राजीव..जब तक मैं नारी को उसका खङा ( ऊँचा ) मुकाम नहीं दिलवा देती । खङी ही रहूँगी । 
( और दूसरी बहना ये काम चैम्बर में बैठे बैठे ) मैंयने खाली सोचा यार ..कहकर पंगा कौन लेता ?
खैर मैंने अपने लेपटाप से कहा -  कम्प्यूटर जी..जरा गुगलवा का कान उमेठ ( सर्च ) कर पता करी । कौन कौन अइसन देवी जी हैं ? जो हम आदमी लोगवा का खटिया खङी करके ही छोङी ।
कम्यूटर जी ने तुरन्त ये लाइने पेश कर दी
" नारी से बेहतर नारी को । कौन समझ पायेगा । मिल जायेगी जहां ये शक्तियां । फिर कौन हरा पायेगा ? बदल देगी हर तस्वीर । संगठन की जीत से । हर राह सुलभ हो जायेगी । एकता की जंजीर से । एक पल ठहरे जहां जग हो अभय । खोज करती हूँ उसी आधार की । " ज्योति सिंह...काव्यांजलि
झूल्लेलाल..मैंने सोचा..ये जोत ( ज्योति ) से जोत जलाते चलो । वाली देवी जी कौन हैं ?
तो मध्यप्रदेश सतना की ज्योति सिंह जी निकलीं । तो जाईये भैया । और देखिये । इनके ब्लाग पर ये कइसन खरी खरी सुनाइलवा । राम राम ..हम तो चले सन्यास लेने ।
ब्लाग..काव्यांजलि..कल्पतरु