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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

नूतन वर्ष २०१२ की हार्दिक शुभकामनाये !

                       Happy New Year
New Year 2012 WallpapersHappy New Year
''ये  ब्लॉग  अच्छा  लगा  '' के  सभी  सम्मानित  योगदानकर्ताओं  व्  पाठकों  को  नूतन  वर्ष २०१२  की  हार्दिक  शुभकामनाये  ! 
Happy New YearHappy New Year
              ''शुभ  हो  आगमन  
                 अति  शुभ  हो  आगमन  
              खिलखिलाकर  पुष्प  कहते  हैं  
             सुनो  श्रीमन  !
              शुभ  हो  आगमन  ;
               अति  शुभ  हो  आगमन  ''


                                          शिखा कौशिक 
                                    शालिनी कौशिक 

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

Wishing you a very...very...very prosperous new year 2012

आप सभी को नए साल २०१२ की मुबारकबाद .
मालिक हम सबको हर मुसीबत से बचाए और हरेक नेकी का रास्ता दिखाए ताकि हमारा अंजाम अच्छा हो.
आमीन .

अब कुछ अच्छे संदेसे

Something in your smile which speaks to me,
Something in your voice which sings to me,
Something in your eyes which says to me,
That you are the dearest to me.
“Happy New Year”


Another day, another month, another year.
Another smile, another tear, another winter.
A summer too, But there will never be another you!
Wishing a very HAPPY N BLESSED New Year to You!!


We will open the new book.
Its pages are blank.
We are going to put words on them ourselves.
The book is called Opportunity
and
its first chapter is New Year's Day.


When the mid-nite bell rings tonight..
Let it signify new and better things for you,
Let it signify a realisation of all things you wish for,
Wishing you a very...very...very prosperous new year.


Like birds, let us, leave behind what we don’t need to carry…
GRUDGES, SADNESS, PAIN, FEAR and REGRETS.
Life is beautiful.. Enjoy it.
HAPPY NEW YEAR


Beauty..
Freshness..
Dreams..
Truth..
Imagination..
Feeling..
Faith..
Trust..
This is begining of a new year!

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

तो फिर कह दो कि ईश्वर नहीं है....नहीं है.....नहीं है....!!


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!
   बहुत दिनों से दुनिया के तरह-तरह के धर्मग्रंथों-दर्शनशास्त्रों,धर्मों की उत्पत्ति-उनका विकास और भांति-भांति के लोगों द्वारा उनकी भांति-भांति प्रकार की की गयी व्याख्यायों को पढने-समझने-अनुभव करने की चेष्टा किये जा रहा हूँ,आत्मा-ईश्वर-ब्रह्माण्ड,इनका होना-ना होना,अनुमान-तथ्य-रहस्य-तर्क, तरह-तरह के वाद-संवाद और अन्य तरह-तरह विश्लेषण-आक्षेप तथा व्यक्ति-विशेष या समूह द्वारा अपने मत या धर्म को फैलाने हेतु और तत्कालीन शासकों-प्रशासकों द्वारा उसे दबाने-कुचलने हेतु किये गए झगडे-युद्द यह सब पता नहीं क्यों समझने-समझाने से ज्यादा मर्माहत करते हैं,मगर किसी भी प्रकार एक विवेकशील व्यक्ति को ये तर्क मनुष्य के जीवन में उसके द्वारा रचे गए अपने उस धर्म-विशेष को मानने की ही जिद का औचित्य सिद्द करते नहीं प्रतीत होते !! 
          धर्म की महत्ता अगरचे मान भी लें तो किसी एक वाद या धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु किये गए,किये जा रहे युद्दों का भी औचित्य समझ से परे लगता है,अगर यही है धर्म, तो धर्म हो ही क्यों ??     
           धरती पर तरह-तरह के मनुष्यों द्वारा तरह-तरह का जीवन बिठाये जाने के आधार पर पूर्वजन्मों के औचित्य....किसी नालायक का ऐश-विलास-भोग आदि देखकर या किसी लायक का कातर-लोमहर्षक जीवन देखकर कर्म-फल-श्रृंखला और कर्मफलों का औचित्य.....सिद्द किया जाता है !! यानी कि जो कुछ हमें तर्कातीत प्रतीत होता है,उसे हम रहस्यवादी बातों द्वारा उचित करार दे दिया करते हैं और मुझे यह भी अजीब लगता है कि कोई वहशी-हरामखोर-लालची-फरेबी-मक्कार-दुष्ट व्यक्ति,जो करोड़ों-अरबों में खेलता हुआ दिखाई देता है,या जो तमाम आस्था-श्रद्धा और विवेकवान होने के बावजूद फाकामस्ती-तंगहाली में एकदम फटेहाल जीवन जीने को अभिशप्त है,तिस पर भी अन्य तरह-तरह की आपदाएं....इन सबमें साम्य क्या क्या है ...??कर्म-फल...!!??
           इस तरह के प्रश्न विवेकवानों द्वारा पूछे जाते हैं कि समाज में इतनी घोर अनैतिकता क्यों है ??क्यों कोई इतना गरीब है कि खाने के अभाव में, छत के अभाव में,दवाई के अभाव में,या कपड़ों के अभाव में ठण्ड से या लू से या बाढ़ से मर जाता है ??तरह-तरह की आपदाओं और बीमारियों से जूझने,उस दरमियान संचित धन के ख़त्म हो जाने और उसके बावजूद पीड़ित के मर जाने और उसके बीवी-बाल-बच्चों के एकदम से सड़क पर आ जाने की घटनाएं भी रोज देखने को मिलती हैं !!....फिर भी ईश्वर है ! और यह सब होना हमारे की कर्मों का फल !!
         मगर दरअसल इस प्रश्न को ठीक पलट कर पुछा जाना चाहिए (ईश्वर है-नहीं है के तर्कों को परे धर दीजिये) कि कोई बेहद धनवान है और हम यह भी जानते हैं कि यह धन उसने येन-केन-प्रकारेण या किस प्रकार पैदा या संचित किया है,या हडपा है या सीधे-सीधे ना जाने कितनों के पेट पर लात मारकर कमाया है !!(या हरामखोरी की है!!)और वो इतना क्रूर है कि उस-सबके बावजूद...अपने समाज में व्याप्त इस असमानता के बावजूद (जिसका एक जिम्मेवार वो खुद भी है !!) वो अपने संचित धन के वहशी खेल में निमग्न रहता है...अगर ईश्वर है, तो उसके भीतर भी क्यों नहीं है और अगर उसके भीतर नहीं है तो फिर हम यह क्यों ना मान लें कि ईश्वर नहीं ही है !!??
           अगर ईश्वर है तो सबमें होगा,होना चाहिए !! अगर ईश्वर है तो मानवता इतनी-ऐसी पीड़ित नहीं होनी चाहिए !! अगर ईश्वर है तो कर्मफल का बंटवारा भी वाजिब होना चाहिए !!.....मगर जो फल हम आज भोग रहें हैं,वो तो हमारे किसी अन्य जन्मों का सु-फल या कु-फल हैं ना....!! तो बस इसी एक बात से तो ईश्वर होने की बात,उसके होने की उपादेयता भी साबित हो जाती है !!
           इस तरह की बातों पर माथा-फोड़ी करने के बजाय अगर हम इस बात पर विचार कर पायें,तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम अगर खुशहाल हैं और हमारे पास इतना अधिक धन है कि ना जाने हमारी कितनी पीढियां उसे खाएं....फिर भी हमारे ही आस-पास कोई भूख से-ठण्ड से-दवाईयों के अभाव में या छत के अभाव में मर जाए,तो ऐसा क्यों है,अगर हमारे खुद के भीतर ईश्वर नहीं है तो फिर क्यूँ ना हम यह कह दें कि ईश्वर नहीं है,क्योंकि अगर वो है,तो या तो हमारे होने पर थू-थू है और हम गलीच हैं या हममे मौजूद ऐसे लोगों की क्रूरता धन्य है,जो दिन-रात पत्र-पत्रिकाओं और अन्य मीडिया द्वारा चिल्लाए जाते रहने के बावजूद किसी बात पर नहीं पसीजते और पसीजेंगे भी क्यों, क्योंकि वो तो जिस पत्थर के बने हुए हैं उसी के कारण तो शोषण-अत्याचार की सहायता से तरह-तरह ठगई द्वारा यह सब करते हैं,धन कमाने के लिया ह्त्या तक भी करते-करवाते हैं !! अगर फिर भी ईश्वर है तो होगा किसी की बला से !!
           आदमी में व्याप्त तरह-तरह की सदभावनाओं दया-भावों के बावजूद अगर कुछ लोग इन सब बातों से अछूते रहकर सिर्फ-व्-सिर्फ धन कमाने को ही अपना लक्ष्य बनाए धन खाते-पीते-पहनते-ओढ़ते आखिरकार मर जाते हैं और उनको जलाकर दफनाकर कब्रिस्तान-श्मशान में ऊची-ऊंची आध्यात्मिक बातें करने के बावजूद हम घर लौटकर वही सब करने में मशरूफ हो जाते हैं तो फिर भला ईश्वर कैसे है ??
            हमारे होने के बावजूद यदि सब कुछ ऐसा है और ऐसा ही चलता रहने को है तो फिर सच कहता हूँ कि हम सब धरती-वासियों को एक साथ खड़े होकर जोर की चीत्कार लगानी चाहिए कि तो फिर कह दो कि ईश्वर नहीं है....नहीं है.....नहीं है....!!
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रविवार, 18 दिसंबर 2011

अंदाज ए मेरा: मुर्गा लडाई का रोमांच

अंदाज ए मेरा: मुर्गा लडाई का रोमांच: स्‍पेन, पुर्तगाल और अमेरिका का बुल फायटिंग (सांड युध्‍द) का नजारा मैंने टीवी पर देखा है..... रोमांच का आलम वहां होता है इस खेल के दौरान पर ...

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

ओ ईश्वर !!क्या तुम यह बता सकते हो...!!??

विरोध के स्वर उठ रहें हैं हैं मगर बहुत धीमे-धीमे 
जैसी कहीं चाय बनायी जा रही हो पीने के लिए 
शायद हम यह नहीं जान पाते कभी कि 
थोड़ी कसमसाहट भी जरूरी होती है जीने के लिए 
उदासियों के शाश्वत माहौल में 
चंद लोगों की खुशियों का रंग हावी है 
ये चंद लोग समा गए है दुनिया की सारी पत्र-पत्रिकाओं में 
और बाकी के बेनूर लोगों पर बेनूरी भी रोया करती है 
फिर भी रात के अंधेरों में रौशनी की चकाचौंध 
सिर्फ चंद दरवाजों पे ही दस्तक देती है 
ये चंद लोग कौन हैं,ब-जाहिर है चारों तरफ 
फिर भी जाने कैसे कब और क्यूँ धरती के 
अरबों जीते-जागते लोग समा गए हैं 
इन चंद लोगों की सुर्ख़ियों की कब्र में 
ये कब्रें मातम कर रहीं हैं हर बखत
ठीक वैसे ही 
जैसे खुशियों की बरसात हो रही है चंद आंगनों तलक 
आदमी सभ्य हो रहा है,आदमी सभ्य हो गया है 
आदमी चाँद पर जा चुका है 
आदमी मंगल पर जाने वाला है 
आदमी ने खोज लिए कई नए ग्रह रहने के लिए 
मगर आदमी अब तक नहीं बना पाया है 
धरती को जीने लायक इंसानियत से भरा-पूरा ग्रह 
अब वो नए ग्रहों का क्या करेगा 
ओ ईश्वर !!क्या तुम यह बता सकते हो...!!??

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रविवार, 11 दिसंबर 2011

माननीय सम्पादक महोदय,


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!

माननीय सम्पादक महोदय,
       आज सवेरे प्रभात खबर का सम्पादकीय पढ़ा,और तब से कुछ प्रश्नों से जूझ रहा हूँ,आपने लिखा "......यह एक तथ्य है कि भीड़ की ताकत संख्या होती है,विवेक नहीं. संसद के विवेक में देश के हर हिस्से से आये हुए जन-प्रतिनिधियों का (सामूहिक)विवेक शामिल होता है.जंतर-मंतर या किसी दूसरी जगह पर जुटी भीड़ का इस्तेमाल सांसदों के सामूहिक विवेक पर दबाव बनाने के लिए तो किया जा सकता है,फैसला लेने या फैसला सुनाने के लिए नहीं  "         
माननीय महोदय,ऐसा लगता है कि ऐसी बातें कतिपय माननीयों का अहम् कायम करने के लिए की जाती हैं.हमारी समझ से तो जनता अपने प्रशासनिक कार्यों की पूर्ति के लिए इन प्रतिनिधियों को संसद या विधान सभाओं में भेजती है,कारण कि इन जगहों पर चूँकि हजारों-लाखों की संख्या में लोग समा नहीं सकते,दूसरा ऐसा करने से एक दूसरी ही अव्यवस्था पैदा हो सकती है इसलिए ऐसा मान कर कि हम जिन्हें इन संवैधानिक जगहों पर भेज रहें हैं,वहां जाकर ये अपने कर्तव्यों का अनुपालन करते हुए हमें समुचित व्यवस्था,सुरक्षा और सु-शासन प्रदान करेंगे,ऐसा विवेक हमारे भीतर होता है मगर जिस सामूहिक विवेक की बात आप कर रहे हो,वह बहुत सारे जन-प्रतिनिधियों के किसी भी प्रकार के आचरण और चरित्र में कभी दिखाई नहीं पड़ता,तात्पर्य यह कि चुने जाने के पश्चात ये अपने लालच के कारण महज अपने स्वार्थों को पूरा करने के अलावा हमसे किये गए वायदों और उन सारी बातों या कर्तव्यों से मुकर गए और ऐसा भी जान पड़ता है कि वो आगे भी ऐसा ही करते रहने वालें हैं और जब जन-प्रतिनिधियों के भ्रष्ट होने की बात की जाती है,तो इशारा साफ़-साफ़ इन्हीं लोगों की और होता है....स्पष्टतया तो अपने आचरण और चरित्र से वे इन जगहों को कलंकित कर रहे होते हैं,जहां होकर देश का मान और जनता "दाम" बढ़ाना चाहिए !!
       किन्तु माननीय सम्पादक हम देखते है कि आप और आप जैसे कतिपय सम्पादक अपने आलेखों में चीख-चीख इन आचरणों और चरित्र पर आवाज़ उठाते हो मगर इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती...आप सबों की पहल पर ये जेल जाते हैं,वहां भी ये गुलछर्रे ही उड़ाते हैं और कुछ दिनों बाद जमानत पर छूट जाते हैं,तो जब देश के या लोकतंत्र चौथे खम्बे के नाम से संवैधानिक दर्जे से सुशोभित इस मंच की आवाज़ का यह हाल है,तो आप सब ज़रा सोचिये कि आम जनता किन हालातों में जीती है और मजा यह कि कल तक अपने बीच में रह रहे किसी आम से सज्जन को अपना सेवक बनने के लिए भेजा जाकर भी अपने को छला हुआ पाती है तो उसके दिल पर क्या गुजरती होगी ?! यह बिलकुल वैसा ही है कि आपने तो तमाम गुण-रूप और आचरण देखकर शादी की मगर शादी होते ही आपका जीवन साथी किसी और के संग रंगरेलियां मनाने लगा...!!    
      और माननीय सम्पादक साहब, तमाम ऐसे प्रतिनिधियों के मानवता को शर्मसार कर देने वाले गंदले चरित्र से या अपने आचरण से दुनिया भर में भारत का मान/भाल नीचा कर देने वाले समस्त-"सु_कर्मों" के बावजूद भी आज तक अपनी संसद या कोई भी विधानसभा कलंकित नहीं हुई नहीं मगर उनके इस चरित्र पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाते ही ये संस्थाएं यकायक कलंकित हो जाया करती है...!! तो क्या जनता इतनी बेगैरत है कि उसके द्वारा किसी वाजिब सवाल को समुचित-सुसंगत तर्कों के साथ उठाये जाने के बावजूद आप उसे लांछित कर दो...??क्या यह भी किन्हीं ताकतवर लोगों का अहम् नहीं है,जो किन्हीं दुसरे ताकतवर लोगों के पक्ष में जा ठहरता है...?? 
         और माननीय सम्पादक साहब,जनता अपनी किस सीमा तक रहे यह तय करने से पहले यह तो तय कर लो कि हमारे भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों और 
उनकी चांडाल-चौकड़ी अपनी किस सीमा तक रहे....मगर इससे पूर्व एक बुनियादी बात यह कि हमने उन्हें वहां चांडाल-चौकड़ी का निर्माण करने हेतु नहीं बल्कि हमारे खुद के लिए सुशासन करने हेतु भेजा है....!!और वो हमारे ही भ्रष्ट राजा बन बैठे हैं....!!यह तो वही बात हुई कि मेरी बिल्ली और मुझी से म्याऊँ...!!....जनता भी विवेकशील ही होती है...अगर ऐसा नहीं है तो विवेकहीनता का तात्पर्य क्या यह भी तो नहीं है कि उसने अपने लिए गलत प्रतिनिधि चुन लिए हैं...??अगर ऐसा है तब तो उन्हें गद्दी से उतारना बनता है....बनता है ना...!!
        मतलब जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनने तक की सीमा तक तो सही या विवेकशील है...उसके बाद उसका यह गुण समाप्त हो जाता है,यही ना...??मतलब यह भी कि एक चुन लिए जाने के बाद जिसे जो चाहे करता रहे और जनता भाड़ में जाए जनता की बला से...!!इसका मतलब यह भी तो है कि जनता के बीच से उठकर जनता के लिए आवाज़ उठाने वाले सारे संविधान-विज्ञ और अन्य सम्मानित लोग चूँकि किसी रूप में संवैधानिक नहीं हैं,इसलिए उन्हें संविधान और संसद का अपमान करने का दोषी ठहराया जा सकता है,और उनपर तमाम गलत-सलत सलत लांछन लगाकर जनता को बरगलाया जाना बिलकुल संवैधानिक है...वाजिब है ??
     तो फिर सम्पादक साहब हम जनता यह आज से सबको यह बताना चाहते हैं कि इस देश के जन्मजात नागरिक होने के कारण सबसे पहले हम संवैधानिक हैं....उसके बाद कोई और...और संविधान में सचमुच अगर हमारे लिए कोई जगह है तो कोई भी संविधान के नाम पर अब ज्यादा दिनों तक हमें भरमाये रख "कुशासन" नहीं लाद सकता....हम भी संविधान के रक्षक हैं....और उसका भक्षण करने वालों को हटाने की कारवाई शुरू कर चुके हैं....जय हिंद....!!
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http://baatpuraanihai.blogspot.com/

     

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

अंदाज ए मेरा: सिब्‍बल बनाम रमन....!!!!!

अंदाज ए मेरा: सिब्‍बल बनाम रमन....!!!!!: कपिल सिब्‍बल कपिल सिब्‍बल। पेशे से वकील। कांग्रेस के बडे नेता और मौजूदा मनमोहन सरकार में मानव संसाधन मंत्री। डा रमन सिंह। पेशे से चि...

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

लोकतंत्र...!! हा...हा...हा...हा....क्यूँ मजाक करते हैं साहब !!


मैं भूत बोल रहा हूँ..........!!



लोकतंत्र...!! हा...हा...हा...हा....क्यूँ मजाक करते हैं साहब !!

          जब से सामाजिक मुद्दों पर सोचना-लिखना शुरू किया,या यूँ कहिये कि जबसे समाज के बारे समझने की उम्र हुई,तब से एक मुद्दा सदैव ज्वलंत मुद्दा बना रहा है मन में,वो यह है,भारत के लोग,उसकी समस्याएं,भारत का लोकतंत्र,लोकतंत्र के कारण पैदा हुई समस्याएँ और लोगों की मनोवृति के कारण लोकतंत्र में पैदा हो रही समस्याएं !!
         भारत के अ-शिक्षित,अर्द्धसाक्षर लोकतंत्र में जो तरह-तरह की विचित्रताएं हैं,उसके कारण इसे लोकतंत्र की संज्ञा देना वैसे तो लोकतंत्र शब्द की अवज्ञा है मगर अब जब यह मान ही लिया गया है कि भारत में लोकतंत्र ही है,तो मानना ही पडेगा !!मगर सच्चाई तो यह है कि भारत के शासकों की प्रवृति सदा से शाश्वतरूपेण राजशाही की ही रही है और आज भी है और लोकतंत्र की तमाम संस्थाओं का ताना-बाना भी राजशाही भरा ही है और बजाय किसी आम सहमति के तमाम जगहों पर संस्थाओं में जायज या नाजायज ढंग से काबिज लोगों के काबिल या नाकाबिल वंशज ही मनोनीत कर दिए जाते हैं और ना सिर्फ आम जनता बल्कि संस्था के कार्यकर्ता भी उस व्यक्ति को पूजते रहते हैं,जिसे दरअसल कुछ विवेकवान लोगों या संस्थाओं द्वारा चोरी-छिपे या सरे-आम गरियाया भी जाता रहता है !!
          भारत का लोकतंत्र दरअसल यहाँ के हरेक आम या ख़ास की एक ऐसी बपौती है,जिसकी कि कोई परिभाषा नहीं हैं मगर जिसके लिए जो जो भी कह रहा है वो सही है,जो भी कर रहा है वो भी सही है और हर एक कोई इतना सही है कि दूसरे को गलत साबित करने के लिए वो किसी भी तरह की हिंसा की सारी हदें पार करने तक को तैयार है और दरअसल यहीं से इस लोकतंत्र की विचित्रताएं प्रारम्भ होती हैं,जो विचित्रताओं से ज्यादा भयानक हैं, वीभत्स हैं,क्रूर हैं !!जिसे कतई लोक का तंत्र नहीं कहा जाना चाहिए मगर इसे महान की संज्ञा जो देनी ठहरी,इसलिए इसे विश्व का विशालतम लोकतंत्र कहा जाता है,मगर मेरे जैसों के लिए यह सदा से कौतूहल का विषय बना हुआ है वो भी इतना ज्यादा कि इस पर कोई ग्रन्थ ही लिख मारूं मगर लिखने बोलने और सत्संग करने से अगर लोग बदल जाया करते तो ऋषियों-महर्षियों की जितनी बड़ी फ़ौज भारत नाम के इस देश में हो चुकी और उससे भी कई गुनी आज के दौर में हुई और फली-फूली जा रही है,भारत कब का स्वर्ग बन चुका होता,होना चाहिए था...मगर सारे नामी-गिरामी स्वर्गवासी हो चुके,हुए जा रहें हैं,भारत का कुछ बनता ना बिगड़ता है,निजी उपलब्धियों को भले आप कुछ भी नाम दे दो,उससे भारत की अधिसंख्य जनता का एक धेला भी नहीं कुछ होता !!
          यह बड़ा विचित्र नहीं है कि आप किसी देश को प्रेम तो करते होंओं मगर उस प्रेम की एक भी शर्त पूरी नहीं करते सिवाय एक यहाँ पैदा होने के और मजा यह कि उस पर आपका कोई हक़ ना था !!
अगर आप किसी भी देश में पैदा होने को लेकर अगर उसका गुणगान करते हो,या फिर उसकी निंदा या आलोचना जो भी करते हो,मगर दरअसल आप उसके हक़ या बेहतरी के लिए क्या करते हो?कुछ करते भी हो या नहीं !!अजीब हाल है यहाँ का एक रात को तो सब चोरी करते हैं और सुबह से शाम तक सब चिल्लाते हैं कि चोर-आया-चोर आया !!और चोर कौन है यह पता ही नहीं चलता....और अगर पता चल भी पाता है तो उसमें भी बरसों अदालती कार्यवाहियों के बाद ससम्मान छूट जाते हैं,क़ानून को धत्ता बताकर....और गलती से किसी को दंड मिल भी जाए तो इसे भारत की समझ लीजिये !!
         हम भारतीयों में बहुतेरे तो अकर्मण्य हैं,काहिल हैं और रही सही कसर कुछ सरकारी योजनायें पूरी कर देती हैं हमें और अधिक अकर्मण्य बना डालने के लिए ! मगर तुर्रा यह कि हम यह मानते भी नहीं और अगर हमें कोई काहिल कह भी दे तो फिर देखिये कि क्या होता है...! अनपढ़ लोग तो जाहिल-गंवार कहे जाते हैं,मगर पढ़े-लिखों का आचरण देखकर भी ऐसा नहीं लगता कि किसी भी सूरत में उनसे कमतर कहे जाने योग्य हैं,मगर मित्रों,अनपढ़ तो अनपढ़ है ही ,आपने भी पढ़-लिखकर कौन सा बड़ा तीर मार लिया...अगर आपका आचरण भी ऐसा ही है तो आप तो उससे भी गए-बीते हुए ना ?मगर कोई आपको ऐसा कहकर तो देखे !! मगर तमाम अ-संस्कार.कु-संस्कार, अ-लोकतांत्रिक, अ-सामाजिक और सभी तरह के सामाजिक कर्तव्यों से च्यूत रहकर भी आप अहंकार की भाषा का उपयोग करें,यह लाजिमी तो नहीं लगता मगर सवाल तो यह है कि यह आपको बतलाये-समझाए कौन ?
         आखिरी बात यह है अगर कोई बेहतर ना कर पाए तो शायद चल भी सकता है,मगर इसके ठीक उलट बुरा किया जाए तो इसका परिणाम भी निश्चित रूप से बुरा ही होगा,होगा ना...??तो भारत में दरअसल यही होता आ रहा है,हम सब अपनी-अपनी जगह पर अपनी-अपनी औकात के अनुसार भारत को लूट रहें हैं,लूटे जा रहें हैं!!कोई सीधा बन्दूक के बल पर लूट लेता है,जिसे हम डकैती कहतें हैं,तो कोई  सरकारी नियमों में डकैती कर डकैतों से भी कई गुना की डकैती करते चले आ रहें हैं,मगर उनका कोई माई का लाल बाल भी बांका नहीं कर पाता क्योंकि उन्होंने बन्दूक नहीं उठायी हुई है और यह वीभत्स खेल दरअसल जनता के तमाम तरह के हितों की अनदेखी करके नहीं बल्कि उन्ही का हिस्सा हजम करके किया जा रहा है,और मजा यह कि किसी को राई-रत्ती भर भी शर्म नहीं आती !!
          और दरअसल यही वो जगह है जहां पर कि सवाल नहीं उठता,वो सवाल है शर्म का,जो दुर्भाग्य से हम सबने खो दी है,किसी ने ज्यादा तो किसी ने कम और जिसने जितनी ज्यादा शर्म खोयी है वो उतना ही ज्यादा वैभवशाली है और मजा यह भी है हमहीं लोगों ने उसे प्रतिष्ठा भी प्रदान भी की हुई है !! दोस्तों,आदमी अगर अपना कोई आचरण खो दे तो शायद उसे राह पर लाया भी जा सकता है मगर आदमी अगर अपनी शर्म ही खो दे तो वो एक पत्थर हो जाता है,जिस पर माथा पटकने से अपना माथा फूटने के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता...!!और हम भारतीय अब वही पत्थर हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र आज अपना सर पीट रहा है...माथा धुन रहा है,मगर मजाल है कि हमें कोई फर्क भी पड़े !!
अर्ज़ किया "जब एक ही उल्लू काफी था बर्बादे-गुलिस्ताँ करने को,हर शाख पे उल्लू बैठा है,अंजामे-गुलिस्ताँ क्या होगा...!!
--
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हमें चाहिए होता है प्यार


हमें चाहिए होता है प्यार

और हम चुनते हैं सुन्दर-कीमती कपडे


हमें चाहिए होता है प्यार


हम चुनते हैं धन-संपत्ति-मकान


हमें चाहिए होता है प्यार


हम चुनते हैं अच्छा भोजन,अच्छे रेस्टोरेंट


हमें चाहिए होता है प्यार


हम चुनते हैं पैसे वाले दोस्त-रिश्तेदार


और बदले में दुत्कार देते हैं


अपने ही किसी कमजोर रिश्तेदार को


चाहे क्यों ना हो वो हमारा अपना ही खून


और इस तरह


हमें चाहिए होता है प्यार


मगर हम चुन लेते हैं


घृणा-अविश्वास-लालच और फरेब


अंततः हमें चाहिए होता है प्यार


और हम चुन लेते हैं


हमेशा के लिए शत्रुता


और इस तरह हमें जिन्दगी में


अपना चाहा हुआ सब कुछ मिल जाता है


बस एक सच्चे प्यार के सिवा.....!!

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

अंदाज ए मेरा: एक और एक ग्‍यारह.......

अंदाज ए मेरा: एक और एक ग्‍यारह.......: एक पुरानी कहावत है एक और एक ग्‍यारह होते हैं। इसका आशय यह है कि जो काम एक व्‍यक्ति नहीं कर सकता उसे एक से ज्‍यादा लोग मिलकर कर सकते है...